हिमाचल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
अनुकम्पा आधार पर नियुक्ति के लिए भी न्यूनतम योग्यता होना जरूरी
शिमला, 19 जून।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकम्पा आधार पर नियुक्ति के लिए भी न्यूनतम योग्यता होना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि क्लास-फोर पद पर नियुक्ति के लिए, चाहे वह दैनिक वेतन के आधार पर ही क्यों न हो, कम से कम योग्यता 10वीं पास होनी चाहिए।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि प्रार्थी के खिलाफ शिक्षा विभाग द्वारा जारी विवादित आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता की योग्यता केवल 8वीं कक्षा तक है। इसलिए, जाहिर है कि याचिकाकर्ता के पास क्लास फोर पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक न्यूनतम शैक्षिक योग्यता नहीं है, इसलिए इस आधार पर अपना दावा खारिज किए जाने को लेकर याचिकाकर्ता कोई शिकायत नहीं कर सकता।
वर्ष 2019 में जारी अनुकम्पा नियुक्ति पॉलिसी में यह बताया गया है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति मूल रूप से उसी विभाग में दी जानी है जिससे मृतक कर्मचारी या चिकित्सकीय आधार पर सेवानिवृत्त कर्मचारी जुड़ा था, बशर्ते कि न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और पद के लिए निर्धारित कौशल पूरे किए जाएं। उक्त क्लॉज में यह भी कहा गया है कि यदि मृतक कर्मचारी दैनिक वेतनभोगी था, तो रोजगार सहायता भी दैनिक वेतन के आधार पर ही दी जाएगी और क्लास-फोर पदों पर अनुकंपा के आधार पर दी जाने वाली नियुक्ति भी दैनिक वेतन के आधार पर होगी।
इस प्रकार अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति पाने के लिए उम्मीदवार को न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और पद के लिए निर्धारित कौशल, दोनों को पूरा करना होगा।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सीनियर अफसर द्वारा जूनियर अफसर को गलत काम करने के लिए मजबूर करने और नौकरी से हटाने की सजा को कठोर सजा ठहराया। कोर्ट ने इस सजा को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत की सजा में बदलने के आदेश दिए। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बी सी नेगी की खंडपीठ ने प्रार्थी की अपील का निपटारा करते हुए यह आदेश दिए। कोर्ट ने कहा कि जब सीनियर अफ़सर को अपने लैपटॉप की मदद से अपनी पत्नी के साथ अपने जूनियर द्वारा की गई अश्लील वीडियो सीडी बनाने और प्रार्थी जूनियर को गलत काम करने के लिए मजबूर करने का दोषी पाया गया था, तो मौजूदा अपील करने वाले प्रार्थी को नौकरी से हटाने जैसी कड़ी सज़ा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा तथ्यों और हालात को देखते हुए, अपीलकर्ता को अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश इस मामले को सुलझा देगा, खासकर उस गलत काम के तरीके को देखते हुए जो बहुत ही शर्मनाक था। कोर्ट ने पाया कि सीनियर अफ़सर को सिर्फ़ दो साल के लिए इंक्रीमेंट रोकने की सज़ा दी गई थी, जबकि अपील करने वाले को नौकरी से हटा दिया गया था, जो सर्विस कानून के तहत भेदभावपूर्ण है। कोर्ट ने सीनियर अफसर की पत्नी के बयान में पाया कि उसके पति ने उसकी मर्ज़ी के बिना उसे शराब पिलाई और प्रार्थी जूनियर अफसर को उसके साथ गलत काम करने के लिए मजबूर किया और उसकी वीडियो भी बनाई तथा उसे बुरा अंजाम भुगतने की धमकी देकर यह बात किसी को न बताने को कहा। कोर्ट ने कहा कि यह साफ़ है कि इसी आधार पर सीनियर अफ़सर को अपनी पत्नी और अपने सुरक्षा सहायक के बीच यौन संबंध को अपने लैपटॉप पर रिकॉर्ड करने के दूसरे आरोप में दोषी पाया गया और सज़ा भी दी गई। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता और सीनियर की पत्नी के बीच गलत रिश्ते के लिए उकसाने वाला सीनियर अफसर था जिसके लिए उसे सज़ा दी गई थी।











