मिजोरम मॉडल से नशाखोरी पर काबू पा सकता है हिमाचल और पंजाब
सामुदायिक सहभागिता और धर्म का सहारा है मिजोरम का मूल मंत्र
मिजोरम में हर 14 साल के बच्चे को मिजोरम यंग एसोसिएशन का सदस्य बनना जरूरी
आइजोल, 29 मार्च।
नशे की विकराल समस्या से जूझ रहे हिमाचल और पंजाब में मिजोरम मॉडल से आसानी से काबू पाया जा सकता है। सामुदायिक सहभागिता और धर्म आधारित यह मॉडल मिजोरम में नशाखोरी को रोकने और युवा पीढ़ी को देश निर्माण में लगाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
मिजोरम में सामुदायिक सहभागिता और चर्च नशाखोरी को रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मिजोरम यंग संगठन और चर्च लगातार इस राज्य में लोगों खासकर युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित कर रहा है। महज 12 से 15 लाख की आबादी वाले इस राज्य पिछले कुछ समय से मणिपुर में चल रही जातीय हिंसा के कारण ड्रग माफिया के लिए नया और सुरक्षित रूट बना है लेकिन प्रशासन, स्थानीय जनता और चर्च की सहभागिता के चलते ड्रग माफिया की अब लगातार कमर तोड़ी जा रही है। पंजाब और हिमाचल की तरह ही मिजोरम में भी सीमा पर यानी म्यांमार से नशा लगातार भारत की सीमा में धकेला जा रहा है यह नशा मिजोरम के रास्ते न केवल पूरे नॉर्थ ईस्ट में बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी पहुंच रहा है। मणिपुर के मिजोरम के राज्यपाल व पूर्व थल सेना प्रमुख वी के सिंह का कहना है कि भले ही मिजोरम ड्रग माफिया के लिए नशे को भारत के अंदर पहुंचाने के लिए एक सुरक्षित रास्ता बना है लेकिन मिजोरम के लोग खासकर युवा पीढ़ी अभी भी छिटपुट घटनाओं को छोड़कर नशे के जंजाल से दूर है। यही कारण है कि अब राज्य में सामुदायिक भागीदारी, मिजोरम यंग एसोसिएशन और चर्च के मिले-जुले प्रयासों से लगातार ड्रग माफिया की कमर तोड़ी जा रही है। मिजोरम में म्यांमार सीमा से राज्य की राजधानी आइजोल से होते हुए नॉर्थ ईस्ट में ड्रग माफिया नशे की खेप को पहुंचा रहा है लेकिन सामुदायिक भागीदारी के चलते लगातार पुलिस की पकड़ में भी आ रहा है क्योंकि स्थानीय लोग न केवल नशे को रोकने के लिए बल्कि राज्य की युवा पीढ़ी को नशे की दलदल में जाने से बचाने के लिए भी लगातार सूचनाएं पुलिस और प्रशासन तक पहुंचा रहे हैं। इसके अलावा मिजोरम में 14 वर्ष की आयु पूरी करने वाले हर युवा अथवा युवती को मिजोरम यंग एसोसिएशन का सदस्य बनना जरूरी है जहां उन्हें नशा खोरी जैसी समस्या से दूर रहने, स्वच्छता और शिक्षा जैसे क्षेत्र में आगे बढ़ने का पाठ सिखाया जाता है। मिजोरम यंग एसोसिएशन के सदस्य वी जेड, फेमा और जबांग के अनुसार मिजोरम के हर व्यक्ति को हर शनिवार को 2 घंटे चर्च में जाना जरूरी है जहां उन्हें सामाजिक दायित्वों के बारे में शिक्षा दी जाती है। इसी दौरान युवाओं को नशे जैसी सामाजिक बुराई से दूर रहने का भी सबक सिखाया जाता है। मिजोरम की 95 प्रतिशत आबादी इसी है।
सामुदायिक सहभागिता के इसी मॉडल को यदि हिमाचल और पंजाब जैसे नशाखोरी प्रभावित राज्यों में लोगों को जागरुक करने के लिए लागू किया जाता है तो ड्रग माफिया पर काबू पाना या उसकी कमर तोड़ना कोई कठिन काम नहीं होगा। हालांकि यह दीगर बात है कि पंजाब और हिमाचल के सीमावर्ती जिलों में नशा गांव गांव तक पकड़ बना चुका है। इसके चलते स्थानीय लोग बड़ी संख्या में इस काले कारोबार में शामिल हो गए हैं। ऐसे में पुलिस को खासकर ड्रग तस्करी के लिए जिम्मेवार बड़े लोगों तक पहुंचने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
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क्या कहते हैं मिजोरम के राज्यपाल
मिजोरम के राज्यपाल व देश के पूर्व थल सेनाध्यक्ष वीके सिंह का कहना है कि मणिपुर में जातीय हिंसा के करण ड्रग माफिया सबसे अधिक प्रभावित हुआ है और इस राज्य के माध्यम से उसका नशे का कारोबार लगभग खत्म हो गया है। ऐसे में उसने मिजोरम को नए रास्ते के रूप में ढूंढा है और अब सबसे अधिक नशा इस राज्य के माध्यम से नॉर्थ ईस्ट में पहुंच रहा है। उनका कहना है कि नशे को जहां सामुदायिक भागीदारी से फैलने से रोका जा सकता है वहीं बॉर्डर पर वर्चुअल फैंस लगाकर भी इस पर काफी अधिक रोक लगा सकती है। वीके सिंह का यह भी कहना है कि वर्चुअल तारबंदी वास्तविक तारबंदी से के मुकाबले 10 गुना सस्ती है। ऐसे में केंद्र और राज्य को इस प्रदेश के रास्ते से ड्रग को भारत में आने से रोकने के लिए वर्चुअल तारबंदी पर गंभीरता से सोचना होगा। राज्यपाल ने इस संबंध में केंद्र में लोक भवन की ओर से एक प्रस्ताव भी भेजा है।










